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बुधवार, 27 अप्रैल 2016

                ''पुरुष से पिता ''

                                                                                                                मनोज त्रिपाठी                         

 एक बार ये पोस्ट पढ़ जरूर लीजिएगा...
अच्छा लगेगा।
पत्नी जब स्वयं माँ बनने का समाचार सुनाये और वो खबर सुन, आँखों में से खुशी के आंसू टप टप गिरने लगे
तब... आदमी...
'पुरुष से पिता बनता है'
नर्स द्वारा कपडे में लिपटा कुछ पाउण्ड का दिया जीव, जवाबदारी का प्रचण्ड बोझ का अहसास कराये , तब ... आदमी...
'पुरुष से पिता बनता है'
रात - आधी रात, जागकर पत्नी के साथ, बेबी का डायपर बदलता है, और बच्चे को कमर में उठा कर घूमता है, उसे चुप कराता है, पत्नी को कहता है तू सो जा में इसे सुला दूँगा।
तब... आदमी...
'पुरुष से पिता बनता है'
मित्रों के साथ घूमना, पार्टी करना जब नीरस लगने लगे और पैर घर की तरफ बरबस दौड़ लगाये
तब ... आदमी...
'पुरुष से पिता बनता है'
'हमने कभी लाईन में खड़ा होना नहीं सीखा' कह, हमेशा ब्लैक में टिकट लेने वाला, बच्चे के स्कूल Admission का फॉर्म लेने हेतु पूरी ईमानदारी से सुबह ८ बजे लाईन में खड़ा होने लगे
तब... आदमी...
'पुरुष से पिता बनता है'
जिसे सुबह उठाते साक्षात कुम्भकरण की याद आती हो और वो जब रात को बार बार उठ कर ये देखने लगे की मेरा हाथ या पैर कही बच्चे के ऊपर तो नहीं आ गया एवम् सोने में पूरी सावधानी रखने लगे
तब... आदमी...
'पुरुष से पिता बनता है'
असलियत में एक ही थप्पड़ से सामने वाले को चारो खाने चित करने वाला, जब बच्चे के साथ झूठमूठ की fighting में बच्चे की नाजुक थप्पड़ से जमीन पर गिरने लगे
तब... आदमी...
'पुरुष से पिता बनता है'
खुद भले ही कम पढ़ा या अनपढ़ हो, काम से घर आकर बच्चों को 'पढ़ाई बराबर करना, होमवर्क पूरा किया या नहीं'
बड़ी ही गंभीरता से कहे
तब... आदमी...
'पुरुष से पिता बनता है'
खुद ही की कल की मेहनत पर ऐश करने वाला, अचानक बच्चों के आने वाले कल के लिए आज compromises करने लगे
तब... आदमी...
'पुरुष से पिता बनता है'
ऑफिस का बॉस, कईयों को आदेश देने वाला, स्कूल की पेरेंट्स मीटिंग में क्लास टीचर के सामने डरा सहमा सा, कान में तेल डाला हो ऐसे उनकी हर Instruction ध्यान से सुनने लगे
तब... आदमी...
'पुरुष से पिता बनता है'
खुद की पदोन्नति से भी ज्यादा
बच्चे की स्कूल की सादी यूनिट टेस्ट की ज्यादा चिंता करने लगे
तब... आदमी...
'पुरुष से पिता बनता है'
खुद के जन्मदिन का उत्साह से ज्यादा बच्चों के Birthday पार्टी की तैयारी में मग्न रहे
तब... आदमी...
'पुरुष से पिता बनाता है'
हमेशा अच्छी अच्छी गाडियो में घूमने वाला, जब बच्चे की सायकल की सीट पकड़ कर उसके पीछे भागने में खुश होने लगे
तब... आदमी...
'पुरुष से पिता बनता है'
खुदने देखी दुनिया, और खुद ने की अगणित भूले बच्चे ना करे, इसलिये उन्हें टोकने की शुरुआत करे
तब... आदमी...
'पुरुष से पिता बनता है'
बच्चों को कॉलेज में प्रवेश के लिए, किसी भी तरह पैसे ला कर अथवा वर्चस्व वाले व्यक्ति के सामने दोनों हाथ जोड़े
तब... आदमी...
'पुरुष से पिता बनता है'
'आपका समय अलग था,
अब ज़माना बदल गया है,
आपको कुछ मालूम नहीं'
'This is generation gap'
ये शब्द खुद ने कभी बोला ये याद आये और मन ही मन बाबूजी को याद कर माफी माँगने लगे
तब... आदमी...
'पुरुष से पिता बनता है'
लड़का बाहर चला जाएगा, लड़की ससुराल, ये खबर होने के बावजूद, उनके लिए सतत प्रयत्नशील रहे
तब... आदमी...
'पुरुष से पिता बनता है'
बच्चों को बड़ा करते करते कब बुढापा आ गया, इस पर ध्यान ही नहीं जाता, और जब ध्यान आता है तब उसका कोइ अर्थ नहीं रहता
तब... आदमी...
'पुरुष से पिता बनता है'

मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

      मन मन्थन - अंत भला तो सब भला (एक मौलिक चिंतन)

                                                                                                                    प्रियंवदा अवस्‍थी

यथार्थ जीवन और पूर्वनिर्धारित जीवन दोनों ही एक नियत मार्ग पर विषम दिशा में बहने वाली दो धाराये हैं ,एक सांसारिक व्यक्ति को आगे को ले जाती है तो दूसरी सामने से आकर हमे कुछ न कुछ सबक बताती सिखलाती हुई पीछे को निकल जाती है ।सो एक ही पथ के अनुगामियों की आमने सामने आकर जब तब परस्पर टकराहट हो जाना भी स्वाभाविक प्रक्रिया है इससे कब तक मुंह चुरायेंगे हम इंसान ।जीवन में घटित हर वह घटना दुर्घटना जिसे मैं मेरे अनुकूल करने में अक्षम हूँ सब मेरे प्रारब्ध कर्म के ही परिणाम हैं, इस बात को समय अपने साथ चलाते चलाते स्वीकारना सिखला देता है। इस सफर में क्या खोया पाया क्या दिया लिया समस्त हानि लाभ को इकठ्ठा कर इन सबका हिसाब किताब भले ही करके हम अपने मन को व्यथित करें पर इससे हमारा कुछ भला नही होता उलटे अपनी ही ऊर्जा का क्षरण करते रहते हैं हम घुट घुट कर ।भावनाओं से ही तो हम इंसान कहलाये हैं और जब किसी भी वस्तु व्यक्ति या स्थितिवश भावनाएं दूषित होने लगे तो समझो आगे फिर घोर अंधकार ही है । स्थिति को बदलने की क्षमता जब आपमें न बचे तब आपको वो विकल्प चुनना चाहिए जिससे आप आगे का सफर सुगमता से कर सकें । कदचित यह विकल्प अध्यात्म से हमें जाकर जोड़ता है ।सम्बन्ध का अर्थ है समान रूप से बंधे रहना ,एक तरफा कोई सम्बन्ध लम्बी दूरी नही तय कर सकता इनकी दृढ़ता के लिए अन्यान्य धरातलों पर सामन्जस्य जरूरी है।आप किसी की प्रकृति नही बदल सकते किन्तु स्वतः साम्य कर परिस्थितियां जरूर अनुकूल बना सकते हैं ।रिश्तों को बनाये बचाये रखने के लिए दो व्यक्तियों का उनकी आपसी प्रकृति को समझते हुए, स्वीकारते हुए उनके मध्य सामन्जस्य बिठाना एक सुंदर विकल्प होता है जो परस्पर सम्पादित है जिससे कोई आपसी खींचतान नही हो सकती, और सब कुछ मर्यादानुकूल तथा सम्यक ढंग से चलता रहता है ।मौसम की तरह ये भावनाएं भी तो समय समय पर अपने रंग ढंग बदलती रहती हैं पर यदि आपमें सामन्जस्य करने का जज्बा मजबूत है तो बदलते मौसम और वक्त वक्त की भावनाओं के उतार चढ़ाव कभी भी किसी के लिए दर्दनाक मन्ज़र नही बनते ।जिन्हें भी प्रकृति के नियमानुसार बदलते मौसमों के मिजाज़ का दिल से अहसास है वे हर मौसम का अपने अंदाज़ से लुत्फ़ उठाते है पर जिन्हें इनका अस्तित्व महसूस करते हुए भी कोई कोमल अहसास न जगे और वे सिर्फ एक ही लीक एक ही धुरी पर चलने के आदी हों उनको तो कोई भी किसी भी प्रकार का परिवर्तन अच्छा नही लगेगा और यही मन की अशांति का मूल कारण भी बनेगा।व्यक्ति व्यक्ति का एक ही स्थिति पर चिंतन भिन्न अवश्य ही हो किन्तु सार्वभौमिक सत्य को न काटते हुए यदि व्यक्ति जीवन जीने के सुंदर सलीके निकालता है तो भिन्न विचार होते हुए भी वह सर्वमान्य ही होंगे और ऐसे सम्बन्ध सम्मानित भी होते हैं।
                  ये मेरा चिंतन है आपका भी हो ऐसा जरूरी नही मुद्दा ये कि अंत भला तो सब भला । .......................( लेखि‍का करुणावती साहित्‍य धारा पत्रिका की सलाहकार हैं ।)

सोमवार, 25 अप्रैल 2016

                                   कहानी (छोटी सी भूल )  

                                                                                                            संगीता सिंह 'भावना' 

                          नवंबर की सोंधी धूप कुछ-कुछ शरीर को सुकून देने लगा था,मौसम में थोड़ी नमी थी फिर भी प्रकृति और मौसम के बीच गज़ब का समन्वय और संतुलन अद्भुत बात थी | रेवा अपने और प्रशांत के बीच के संतुलन को आँकने लगी और अतीत की गहराइयों में उलझती चली गई | ,रेवा घर के काम समेटकर खुद को थोड़ा तैयार किया और बालकनी की ओझल होती धूप का आनंद एक कप चाय लेकर करने पहुँच गई | अभी प्रशांत के आने में करीब घंटे भर की देरी थी , हालांकि ऑफिस से आने वाले लोगों का क्रम चालू हो गया था | उसका किराए का मकान था तो महंगा पर बाजार की गहमागहमी और बाकी सारी सुविधाओं  को देखते हुये उसने पैसे को ज्यादा महत्व नहीं दिया | और फिर प्रशांत की गैर हाजिरी में उसके मन बहलाने का साधन भी तो यही मकान था | शादी के नौ  बरस पूरे होने को थे पर यूं लगता था जैसे एक युग बीत गया | इन नौ  सालों में रेवा ने बस एक सी रूटीन लाइफ ही देखी थी ,रोज सुबह उठकर प्रशांत को चाय और अखबार पकड़ाती और दैनिक दिनचर्या में लग जाती फिर वही शाम को प्रशांत के ऑफिस से लौटने का इंतजार और फिर थोड़ी बहुत औपचारिक बातचीत के बाद नीरव शांति .....! न कोई उत्साह न कोई उमंग |इन नौ  सालों में यादों का एक लंबा सिलसिला बन चुका था ,जिसे याद कर सिर्फ दुख और उदासी के सिवा कुछ भी हासिल नहीं था | रेवा इन्हीं सब बातों मे खोई तीन वर्ष पहले के एक प्रसंग में उलझती चली गई | उन दिनों सुनीता दीदी गर्मी की छुट्टियों में अपनी एकलौती और प्यारी बेटी पीहू के साथ आई हुई थी ,पीहू की चंचलता से पूरा घर एक उत्सव में तब्दील हो गया था | प्रशांत भी उसकी बाल-सुलभ चंचलता से अनभिज्ञ न थे ,रेवा तो बस पूरे दिन पीहू को गोद में चिपकाए रहती और ऐसा करके उसके खाली पड़े वीरान दिल में मातृत्व की भावना प्रबल हो उठती | एक शाम जब रेवा सुनीता दीदी के कमरे में उन्हें चाय के किए जगाने गई तो पीहू सुनीता दीदी से चिपक कर सो रही थी यह देखकर उसका मन भी अपने बच्चे की खातिर तड़पने लगा | खाने -पीने के बाद जब प्रशांत अपने कमरे में कोई पत्रिका लिए पढ़ रहे थे रेवा ने अपने मन की बात प्रशांत से शेयर किया इतना सुनते ही प्रशांत आग-बगुला हो गए और चीखते हुये बोले तुम्हें ये कौन सा नया रोग लग गया है जब देखो बच्चा-बच्चा करते रहती हो ,तुम्हें पता भी है कि तुम्हारी इसी जिद की वजह से मुझे कितनी शर्मिंदगी उठानी पड़ी ,जब डॉक्टर ने यह बताया कि तुम कभी माँ नहीं बन सकती | अचानक तो रेवा को विश्वास ही नहीं हुआ कि यह सत्य है उसने दोनों हाथों से अपने कान को बंद कर लिया और वही निढाल हो फर्श पर गिर गई और पूरा कमरा उसकी सिसकियों से देर रात तक गूँजता रहा | उसके सामने उस दिन की सारी घटना दृष्टिगत होने लगी ............जब डॉक्टर ने रिपोर्ट देखकर कुछ इशारा किया तो एकाएक प्रशांत बड़े प्यार से उसे बाहर ले आए हालांकि उनके चेहरे का रंग उड़ा हुआ था ,,बाहर लाकर उन्होने उसे वहीं बैठने को कहकर खुद केबिन में चले गए और जब केबिन से बाहर आए तो वह प्रशांत और थोड़ी देर पहले के प्रशांत में जमीन आसमान का अंतर था | इन चंद मिनटों में उनका पूरा हुलिया ही बदल  गया था ,वो वर्षों के बीमार प्रतीत हो रहे थे ,,रेवा ने बहुत कोशिश किया यह जानने का कि आखिर हुआ क्या ,डॉक्टर ने क्या कहा .....? पर प्रशांत बड़े ही शांत भाव से उसे यह कहकर बहला दिये कि डॉक्टर ने कहा है कि सब ठीक है और आज अचानक उनका यह कहना कि तुम कभी माँ नहीं बन सकती |  माना कि मर्द के प्यार-मुहब्बत की मियाद बहुत छोटी होती है पर इतनी संकीर्ण भी होती है ये उसने पहली बार जाना | इंसानियत के नाते ही सही ,,कम से कम बोलने के पहले एक बार सोच तो लिया होता कि इस तरह की बातों का एक स्त्री के दिल पर कैसा बीतता है | उस दिन के बाद रेवा कभी भूले से  भी प्रशांत से  बच्चे का जिक्र नहीं किया , औरत अपने प्रति आने वाले प्यार और आकर्षण को समझने में चाहे एक बार भूल कर जाये,लेकिन वह अपने प्रति आने वाली उदासी और उपेक्षा को पहचानने में कभी भूल नहीं करती | प्रशांत का व्यवहार दिन -ब -दिन संकुचित होता जा रहा था ,कभी बहुत खुश होते  फिर अगले ही क्षण मातम मनाने जैसा माहौल बना लेते  | रेवा भी अब पहले जैसी नहीं रही ,वक्त के थपेड़ों ने उसे अंदर तक झकझोर दिया था उसकी आँखों में आंसुओं के समंदर की जगह रेगिस्तान का फैलाव बदस्तूर बढ्ने लगा | पर आज अचानक  प्रशांत के ऑफिस के जरूरी कागजात वाली आलमारी खुली देखकर उसके मन में एक उत्सुकता हुई क्योंकि आज के पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था कि प्रशांत वो आलमारी खुली छोड़ जाए | अभी वह एक दो फाइलों को इधर-उधर खिसकाया ही था कि उसकी नजर गाइनी स्पेशलिस्ट 'अल्का माथुर'' के फाइल पर पड़ी और वह झट उसे खींच कर सरसरी निगाह से देखना शुरू किया | रेवा इतनी पढ़ी-लिखी तो थी कि चीजों को समझ सकती थी ,पर उसने वह फ़ाइल को  लेकर डॉक्टर से मिलना ज्यादा उचित समझा | जब रेवा डॉक्टर के केबिन में पहुंची तो डॉ. अल्का उसे झट पहचान गई और बड़ी ही गर्मजोशी से उसका स्वागत करते हुये पूछा ......और बताओ रेवा --तुमने क्या सोचा है बच्चे के बारे में ......? मैं तो कहती हूँ कि तुम 'टेस्ट ट्यूब बेबी' के लिए अपनी सहमति दे तो ज्यादा अच्छा होगा क्योंकि मैंने सारे प्रयास जो करने थे वो इन बीते दिनों में कर डाले ,,और कहीं से भी प्रशांत के सुधार की गुंजाइश नहीं दिख रही |एकाएक तो रेवा को विश्वास ही नहीं हुआ ,उसने अपने हकलाते आवाज में पूछा.....''तो क्या डॉक्टर मुझमें कोई खराबी नहीं है .....? पर प्रशांत तो कहता है कि मैं माँ बनने के काबिल ही नहीं '' डॉ अल्का को सारा माजरा समझते देर न लगी वह आगे बढ़कर बड़े ही प्यार से रेवा को समझाया .....हाँ रेवा, तुम माँ बनने के बिलकुल काबिल हो और सारी परेशानी प्रशांत में ही है पर उसका पुरुषोचित  दंभ उसे आज भी खुद से न्याय नहीं करने दे रहा | रेवा का पूरा वजूद बर्फ हो चुका था | डॉ ने मामले की गंभीरता को देखते हुये बोली .....रेवा संभालो खुद को और नर्स को बुलाकर दो कप कॉफी भेजने को कहा | जब तक कॉफी बनकर आती तबतक रेवा अतीत के तहखाने में भटकती रही और वो सारे मंजर अनायास दृष्टिगत होते रहे | गरम कॉफी का घूंट पीते हुये रेवा धीरे से बोली,डॉ मैं आज तक इस सच्चाई से अवगत नहीं थी ,इसलिए शायद मेरी यह हालत हो रही है | इन बीते सालों में मैं अनगिनत बार मरी हूँ ,कभी-कभी तो मेरे मन में आत्महत्या तक के भी ख्याल आते थे ,पर अगले ही पल प्रशांत का निरीह चेहरा मुझे रोक देता था | अब इस सच्चाई को कुबूल करने के लिए मुझे वक्त चाहिए | ''हमने अपनी ज़िंदगी के ये महत्वपूर्ण क्षण कुढ़-कुढ़कर गँवा दिए,आप तो अच्छे से समझती होंगी कि यह किसी भी स्त्री की ज़िंदगी के कितने कीमती समय होते हैं | जब घर-आँगन में किलकारियाँ गुंजनी थी और हमारे जीवन में खामोशी का  ग्रहण लगा था '' डॉ चुपचाप रेवा के चेहरे के अंतहीन दर्द  को देखे जा रही थी केबिन में सन्नाटा छाया रहा | समय इंसान को किस कदर बदल  कर रख देता है यह रेवा से ज्यादा इस समय कोई नहीं महसूस कर सकता था | रेवा के लिए ज़िंदगी का यह मोड काफी नाजुक मोड था, उसने खुद को संभालते हुये घर की ओर रुख किया,, और मन ही मन  सोचा .....''क्या हुआ जो प्रशांत मुझे नहीं समझ पाया पर मैं तो अपने प्रशांत को खुशी से संभाल लूँगी '' बालकनी में ठंढ बढ़ चली थी ,जैसे ही वह वापस कमरे में जाने के लिए मुड़ी दूर से प्रशांत दफ्तर से आता दिखाई दिया ,,रेवा अपने चेहरे पर आई हुई उदासी को परे झटककर प्रशांत का खुले दिल से स्वागत किया जैसे कुछ हुआ ही न हो | रात को खा-पीकर जब प्रशांत और रेवा  बिस्तर पर लेटे तो रेवा कमरे के उस फैले अंधेरे में खुली आँखों से चमकते जुगनू को देर रात तक महसूस करती रही ,नींद आँखों से कोसों दूर था | वह प्रशांत से वह सब बातें कहकर उनके बीच आई हुई नीरसता को खत्म करना चाहती थी ,पर बात कहाँ से शुरू करें इसी पाशोपेश में न जाने कितनी देर शून्य को निहारती रही | उधर प्रशांत की आँखों से भी  नींद गायब थी ,उसे बार-बार डॉ.माथुर की चेतावनी याद आ रही थी ......''देखिये मि. प्रशांत ,खुद से भागने से अच्छा है रेवा को सब सच बता दीजिये,क्योंकि पुरुष के पश्चताप स्त्री सहन नहीं कर पाती और जहां तक मैं रेवा को जानती हूँ वह बहुत ही सुलझी महिला है ,वह जरूर आपको माफ कर देगी | एकाएक प्रशांत का अन्तर्मन धिक्कार हो उठा ,मन हुआ कि रेवा के गोद में सिर रखकर रोता रहे , भर्राए गले से उसने पूछा ,''अच्छा रेवा ,एक बात बताओ,इतना सब जानकर भी तुम्हारा मन नहीं घबराया ....? जिन दिनों मैं तुम्हें दोषी करार तुमसे चुप्पी साध लिया था,उन दिनों जरा देर को भी तुम्हारे मन में पराजय की भावना नहीं आई थी ....? मुझे प्रसन्न रखने के लिए तुम्हारे हास्यास्पद प्रयास,मुझे खो देने का भय,,सभी कुछ तो मेरे सामने से गुजरा पर मैं ही बेवकूफ़ न जाने कहाँ भटकता रहा | तुमने  इतनी करुणा क्यों किया मुझपर ,,इसीलिए न कि तुम मुझसे बेहद प्यार करती हो ....? बच्चे के बिना घर क्या होता है ये मैंने भी महसूस किया है,पर मैं डरता था खुद से कि कहीं तुम सारी सच्चाई जानकर मुझसे दूर न चली जाओ और अपनी सारी पृष्ठभूमि के साथ मैं  बिलकुल निरीह और अकेला न रह जाऊँ |   रेवा ने निहायत ही आत्मविश्वास भरे लहजे में कहा ,देखो प्रशांत ,कभी-कभी कोहरे के कारण सूर्य देर से निकलता है ,पर ऐसा नहीं कि वह अपने प्रकाश पुंज को धूमिल कर लेता है ,उसे पता रहता है कि उसका निकलना तय है भले ही थोड़ी देर ही सही | मुझे भी अपने प्रशांत पर पूरा भरोसा था कि एक न एक दिन वह मुझे जरूर समझेगा | 

               नहीं रेवा,मैं तुम्हारा गुनहगार हूँ,पर मैं हारा नहीं हूँ ,मुझे अपनी भूल का पश्चताप है,तू देखती रहना,मैं सब करूंगा,तुम्हें वो सारे सुख दूँगा जिससे तुम आज तक वंचित रही हो ....बोलो रेवा,दोगी न मेरा साथ....? ''और अपने काँपते हाथों से रेवा के दोनों कंधे पकड़कर उसका चेहरा ऊपर उठाकर अपलक निहारता रहा | उसके झुकी पलकों वाले चेहरे को देखकर एक अजीब-सा ख्याल मन में आया ......मानो वह अभी ही ''माँ'' बन गई हो ....! और ऐसा लगा ,जैसे उसका चेहरा पहले से भी अधिक गुलाबी हो गया हो .....|

                                                                     

रविवार, 24 अप्रैल 2016

                  (कहानी) वक्त वक्त की टेर

                                                                                                        विभारानी श्रीवास्‍तव

              काअ हो तहरा घरे सभन चाचा लोगन के अलग अलग न्योता के कार्ड जाई नु ....... ना ना हमरा घरे ऐ गो कार्ड जाई काहेए ….. जब हम तहरा भाई के शादी में अलग न्योता भेजनी अउरी तहरा चचेरा भाई बहीन के शादी में अलीग से न्योता भेजले बानी …..हमरा ईहाँ अइसने होला कि इगो ही न्योता आवेला … चचेरी बहिन लोग के घरे भी बिआह भईल बा नु …. अउरी हमरो घरे कईगो शादी हो चुकल बढियाँ बा …. लेबे बेरा कई जाना बा लोग ….. ली लोग कई गओ …. अउरी दी लोग एगो आगे से हमरा चचेरा भाई बहिन के बिआह होखी त रउआ न्योता मत भेजब …. लेकिन ई बेरा ईगो ही कार्ड भेजल जाव , ना त सभे हमरा के दू चार गो बात सुना दी लोग कि हम बतवले ही ना हओखेब  ना ना हम त चार गओ ही कार्ड भेजेब अउरी हमरा चार गओ न्योता चाहीं त चाहीं । मौका था पुष्पा की ननद की शादी का और बहस छिड़ी थी , पुष्पा और उसकी सास में ….. बहुत समझाने के बाद भी उसकी सास उसके मइके चार कार्ड भेज दी ….. मइके से उसके अपने और चचेरे भाई शादी में शामिल होने आये …. उसके भाई से उसके चचेरे भाई लोग पूछे कि क्या अलग अलग न्योता का चलन शुरू करना है ? नहीं जो अब तक नहीं हुआ वो अब क्यों शुरू होगा ।
                पुष्पा के सगे भाई एक न्योता लाये थे उसे देते हुए बोल दिए कि हमारे घर का रीत इक न्योता ही देने का है , पुष्पा आपलोगों को बताई होगी , आपलोगों को उसकी बात समझनी चाहिए थी …. हर घर की रीत अलग अलग होती है और संयुक्त परिवार की बात ही अलग होती है ….. पुष्पा के ससुर जी बोले कि हाँ पुष्पा बताई थी लेकिन उसकी सास अपनी जिद में किसी की बात सुनती नहीं है । पुष्पा को याद आ रही थी सारी बातें ….. मौका था उसी ननद की बेटी की शादी तैय हुई थी और घर में न्योता देने की बात चल रही थी तो वो बोली कि तीन न्योता जायेगा न ….. आपके घर की रीत जो आपलोगों की माँ मुझे बताई थी … तो उसके पति और देवर मानने के लिए तैयार नहीं हुए …… ऐसा नहीं है ….. आपको याद नहीं है । कार्ड पर हुई बहस के कारण उसकी सास उसे उसकी ननद के शादी की सारी तैयारियों से अलग रखी ही थी साथ कोशिश की थी कि शादी की रस्मों में भी भाग कम से कम ले सके ….. केवल शादी में आये लोगों के भोजन वो पकाये खिलाये ।
               काश सास चार साल और जीवित रहती …… सुनती
वक्त वक्त की टेर
अच्छे अच्छे होते ढ़ेर
ढ़ेर ढ़ेर की हेर फेर               -----------------( लेख‍िका करुणावती साहित्‍य धारा की वर‍िष्‍ठ सलाहकार हैं । )

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016

                                      विश्‍व पुस्‍तक दिवस 

     
    आनन्‍द विक्रम त्रिपाठी 

किताबें सही अर्थों में हमारी अच्‍छी और सच्‍ची मित्र हैं । बचपन का ककहरा अम्‍मा बाबू पढातें हैं और उसके बाद जब स्‍कूल जाना शुरु करतें हैं तो किताबें । फिर तो ये सिलसिला चलता ही रहता है और खास बात ये कि किताबें हमें जब भी मिलती हैं कुछ न कुछ सिखातीं ही हैं , कोई न कोई सीख देकर ही जातीं हैं । उस पर सबसे अच्‍छी बात ये है कि ये बदले में कुछ मॉगती भी नहीं आप कितना भी पढो इन्‍हें ....सच्‍ची । हर उम्र में किताबों का आनन्‍द लिया जाता है । आज के युग में बचपन से लेकर बुढापे तक शायद ही कोई होगा जिसने कभी किताबें न पढ़ी हों , निश्चित ही  किताबों ने एक बार मित्रता का हाथ अवश्‍य बढाया होगा । अब आप इस बात को माने या माने ,भई मैं तो मानता हूॅ । किताबों के पास आप पहुॅचे नहीं कि उनका बुलाना शुरु हो जाता है । पिता जी को गये वर्षों हो गये पर गॉव जब भी जाता हूॅ तो आज भी पहले पिताजी के कमरे में ही जाता हूॅ क्‍यों ....क्‍योंकि इसी कमरे में तो किताबें रहती हैं । और जैसे ही कमरे में प्रवेश करता हूॅ आलमारियों से किताबें झॉकनें लगती हैं कि कौन आया । कहीं कहानी की किताबें बुलातीं हैं , कहीं ज्‍योतिष वाली किताबें तो कहीं पापा की ही लिखी किताबें बुलाती हैं  कि इस बार मुझसे मिलकर ही जाना और मैं भी मन ही मन सोच लेता हूॅ कि इस पक्‍का वो वाली किताब पढूगॉ । सच कह रहा हूॅ और आपने भी महसूस किया हम आलमारियों के पास से जब भी गुजरतें हैं तो महसूस होता है कि कोई बुला रहा है ......है न .....यही किताबें होती हैं । अकेले रहने वाले से पूछ‍िए कि किताबें कहॉ नहीं रहती उसके साथ । पढने खाने की  मेज से लेकर बिस्‍तर के सिराहने तक । कभी कभी तो कुछ लोग गजब कर देतें हैं कि दीर्घ शंका में भी किताब लेकर चले जातें हैं हलॉकि ये किताबों के हिसाब से उचित नहीं हैं , ऐसी पढाई  कुछ  पक्‍के शहराती लोग ही करतें हैं । कुछ लोगों के लिए किताबें दवा की तरह से होती हैं कि नींद लाने के किताबें पढतें हैं तो कुछ नींद भगाने के  लिए । किताबों की मित्रता की परिध‍ि बहुत विस्‍तृत है । इनमें संकीर्णता नहीं हैं मतलब ये कि ये छोटा - बडा , अमीर-गरीब नहीं देखतीं हैं । इसीलिए हर वर्ग हर उम्र में इसको चाहने वाले मिलेंगे । एक बार मेरे कहने से अपने किताबों की आलमारी की तरफ जाइये न , पक्‍का है कि कोई न कोई किताब लेकर ही आयेंगे । किताबों से मित्रता हम सबके लिए फायदेमंद है । २३ अप्रैल को विश्‍व पुस्‍तक दिवस है , क्‍यों न कोई पुस्‍तक खरीद कर ये दिवस मनाया जाये ! 

                          आज ''अर्थ डे '' पर........!!!

                                                                                                               संगीता सिंह 'भावना'
                                                                     

 

 

 

                                     मानव और प्रकृति का रिश्ता सदियों पुराना है,प्रकृति मानव को सदियों से पालती-पोषती आ रही है ,पर हम मनुष्य उसे नजरंदाज कर सदा से प्रकृति को नुकसान पहुंचाते रहे हैं | प्रकृति यूं तो हमारे अपराधों को क्षमा करती रही है,पर कहते हैं न कि ' अति सर्वत्र वर्जयते'' तो मानव की इसी अतियों से क्षुब्ध होकर प्रकृति ने मानव पर पलटवार किया,इस पलटवार ने मानव को अंदर तक झकझोर दिया ,यह नुकसान ऐसा है ,जो सदियों तक मानव के मानस पटल पर बुरे सपने की तरह झकझोरती रहेगी | जिस प्रकृति ने हमारा पालन -पोषण किया ,जिसकी गोद में बैठकर हमने मानव सभ्यता और विकास की यात्रा शुरू की ,प्रकृति की गोद में अटखेलियाँ करते हम उसी प्रकृति से ही खेलना शुरू कर दिया | प्रकृति ने हमें तमाम संसाधन दिए,जिसके बल पर ही हम विकास कर सके ,विकास के बढ़ते क्रम में पहले तो हमने इसे सहभागी बनाया ,लेकिन बढ़ती लालसाओं,एवं आधुनिकता कि होड में हमने इसका शोषण शुरू कर दिया |अपार खनिज सम्पदा से भरपूर पर्वतमालाएं हमारे लिए वरदान से कम न थी ,पर चहुं ओर फैली इन मूलभूत संपातियों का ओर-छोर जाने बिना मनुष्य इसका लगातार दोहन करता रहा नतीजतन प्रकृति ने भी अपने साथ हुये अन्याय का जवाबी कार्यवाई देना शुरू कर दिया | जंगलों की अंधाधुंध कटाई ग्लोबल वार्मिंग के रूप में सामने आ रही है | तापमान में लगातार वृद्धि हो रही है,बादल लगातार गर्म होते जा रहे हैं और इसके और गर्म होने की संभावना लगातार बढ़ते ही जा रही है | कभी सोच कर मन दहल जाता है , कि सात महादेशों से सजी इस धरती पर 'जल बिन कैसा होगा जीवन.......??? पानी का जलस्तर लगातार कम हो रहा है ,इसका एक प्रमुख कारण दिन-ब -दिन कम होती बरसात भी है |

''मेरे देश की धरती सोना उगले,उगले हीरे -मोती'' की अब कल्पना भी बेकार लगती है ,क्योंकि धरती लगातार बंजर होते जा रही है | भूमि के के लगातार होते दोहन से भूमि उपजाऊ लायक नहीं रही ,जो कि खाद्दान्न समस्या का प्रमुख कारण है | लगतार यही दिख रहा है कि हम किसी न किसी रूप में प्रकृति के कोपभाजन बन रहे हैं पर शायद हम अपना सुध-बुध खो दिए हैं ,या हमें इसका ज्ञान ही नहीं रहा कि प्रकृति से खिलवाड़ एक दिन हमारा सब कुछ तहस-नहस कर देगा | हम जिस रफ्तार से विकास कि ओर अग्रसर हो रहे हैं ,शायद उसकी दुगुनी रफ्तार से प्रकृति के कोपभजन के शिकार भी होते जा रहे हैं पृथ्वी हमारे कृत्यों से रुष्ट है इसका एहसास हमें समय-समय पर प्रकृतिक आपदाओं के जरिये कराती रही है पर हम अपनी ही धुन में मग्न हैं अगर हम अब भी नहीं संभले तो वह दिन दूर नहीं जब इसके भयानक परिणाम के जिम्मेदार खुद होंगे |
पलों की तबाही
सदियों का दर्द दे गया
मूक समझ जिसे रौंद रहे थे
साथ वो सबकुछ ले गया ......
अब तो ये मंजर है ,
चहुंओर फैला ये कैसा ,,,
दुखों का समंदर है ......
हिमालय भी है चीखकर पूछ रहा
क्या मैं मिट जाऊंगा ,
तब जागोगे .....???
संगीता सिंह ''भावना''
वाराणसी

सोमवार, 18 अप्रैल 2016

                              

                  परख साहित्‍य की

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                       साहित्य का भूगोल बहुत ही व्यापक है ,इसे न तो किसी सीमा में बांधा जा सकता है और न ही किसी कालखंड में समेटा जा सकता है | बीते कुछ वर्षों में साहित्य ने अपनी विकास यात्रा में चहुँमुखी विकास किया है ,साहित्य के सभी विधाओं में नित नए प्रयोग हो रहे हैं जिसमें साहित्यकारों ने बढ़-चढ़कर अपने कलम की ताकत दिखायी है | साहित्य के सभी विधाओं में खासा प्रगति होने के वावजूद कहानियों पर कुछ ज्यादा ही काम   हो रहा है ,जिसमें नव साहित्यकारों की भूमिका काफी अग्रगणीय है | साहित्यप्रेम जीवन - प्रेम को जन्म देता है ,एक अच्छे साहित्य के अध्येता ये अच्छी तरह से जानते हैं कि एक अच्छे किताब के आने भर से लाखों बातूनी किताबें निरर्थक व् रसहीन हो जाती है | जब कोई  रचनाकार किसी रचना का सृजन करता है तो उसकी दिली ख्वाहिश यही होती है कि उसकी यह रचना जन-जन तक पहुंचे यही नहीं वह यह भी चाहता है कि उसके इस दुनियां में न रहने पर उसकी कृति लोगों के बीच जीवित रहे | हो सकता है वह अपने जीवन काल में साहित्य निधि ज्यादा न बटोर पाया हो पर जब वह इस दुनियां में न रहे तो लोगों के दिलों में रहे | एक रचनाकार कभी भी अकेला नहीं होता है,अकेलेपन में भी उसके विचार उसके साथ होते हैं और यही बात उसे औरों से अलग करती है | साहित्य सृजन हमारे भीतर सिर्फ ज्ञान ही नहीं देता है बल्कि एक नया वातावरण देता है एक नयी सोच देता है जिससे हम चीजों को बारीकी से समझते हैं और समाज के सामने स्वस्थ रूप में परोसते हैं | जब भी कोई साहित्यकार को साहित्यिक पुरस्कार मिलता है तो किसी एक कृति के बजाय उसके समस्त लेखन एवं साहित्यिक सेवा को देखकर दिया जाता है | पर बड़े दुःख की बात है कि आज हमारे साहित्यकार उसी पुरस्कार को वापस कर अपना रोष प्रकट कर रहे हैं जो शायद साहित्यिक नजरिए से अच्छा नहीं है | बरसों बरस लग जाते हैं एक व्यक्ति को लेखक बनने में,भाषा को प्राण देने में तब जाकर एक साहित्य का सृजन होता है ,हमें उस साहित्य की गरिमा को समझना होगा तभी सच्चे अर्थों में हम साहित्य से जुड़ सकते हैं | साहित्यिक गरिमा से ओत-प्रोत व्यक्ति पहले चीजों को समझता है ,तब अपने विचार प्रकट करता है पर आज जो देश में सम्मान वापसी की होड़ लगी है उसे देखकर तो यही लगता है कि हमारे साहित्यकार बिना सोचे-समझे अनुकरण की नीति में बहे जा रहे हैं | हर व्यक्ति की स्मृतियाँ उसका निजी साहित्य होती है,जिस तरह से साहित्य और कला का स्वरुप युद्ध और धन के संबंधके सामान है ठीक उसी प्रकार साहित्य और साहित्यकार दोनों एक -दुसरे की निजी जरुरत हैं | वह मनुष्य बड़ा भाग्यवान है,जिसकी कीर्ति एक साहित्यकार के रूप में व्याप्त है | साहित्य ऐसी साधना है जो ,शायद कलमकार लिखकर भूल गए होंगे पर उनकी यह कीर्ति आज भी चन्दन की भांति अपनी खुशबू हवाओं में बिखेर रही है | साहित्य हमें शब्द-दर-शब्द आईना दिखाती है,हमें जीवन के घोर अंधियारे में मार्ग दिखाती है और एक सच्चे दोस्त की भांति हमारा पथ-प्रदर्शन करती है | साहित्य विहीन समाज पशुता को दर्शाता है ,साहित्य पढने वाला और साहित्य से प्रेम करनेवाला हर शख्स निश्चित ही किसी-न किसी काल में एक श्रेष्ठ साहित्य की उत्पति करता है,जिसे लोग युगों-युगों तक पढ़ते हैं और अपने जीवन चरित्र में उतारते हैं | साहित्य हमारे जीवन के आकेलेपन को कम करती है और व्यस्तम से व्यस्तम दिनचर्या में भी सृजन की और प्रशस्त करती है,पर इधर कुछ वर्षों में साहित्य का बहुत हद तक पतन हुआ है,जिसका हमारे समय पर,हमारी सोच पर ,हमारी सृजनशीलता पर गहरा प्रभाव पड़ा है | साहित्य में बाजारीकरण  की प्रवृति इधर बहुत तेजी से बढ़ रही है, ऐसा लगता है जैसे साहित्य भी महज एक वस्तु,एक उत्पाद बनकर रह गई है तो स्वाभाविक सी बात है कि इस बाजार में मौजूद हर व्यक्ति ऐसी उत्पाद-वस्तु का मूल्य लगाने का अधिकार बहुत ही सहज रूप में पा जाता है  , ऐसे में एक अच्छे साहित्य का बचा रहना थोडा मुश्किल सा प्रतीत होता है | साहित्य की हमेशा से ही एक खास बात रही है कि वह जटिल से जटिल तथ्यों को बड़े ही सहज ढंग से समाज में परोसता है ,ऐसे में साहित्य और साहित्य के वर्तमान को समझना होगा |  पाठकों की भी बड़ी तेजी से कटौती हो रही है,जिसके लिए बाजार,रचनाकार-साहित्यकार सब बराबर के जिम्मेदार हैं | साहित्य में प्रचार-प्रसार पहले भी होता रहा है और आज भी हो रहा है पर इधर कुछ साहित्यकारों ने जिस तेजी से साहित्य को बढ़ा-चढ़ाकर अरुचिकर बनाया है वह बेहद ही चिंतनीय बात है,साहित्य का अपना सत्य होता है उसे किसी भी राजनितिक सत्य की जरुरत नहीं होती है ,पर आज हमारा साहित्य राजनीत जैसे पचड़ों में पड़कर अपनी गरिमा खोता जा रहा है |  आखिर कोई तो कारन होगा कि इतनी प्रचुर मात्रा में साहित्य सृजन और चिंतन होने के बावजूद अभी भी साहित्य का सफ़र पेचिदा है,अभी भी उसकी स्थिति दयनीय है | साहित्य का जन-जन तक पहुँच पाना , हर व्यक्ति के सोच में शामिल होना आज साहित्य की नितांत आवश्यकता है | जिस तरह से महान विचार जब कर्म में परिणित हो जाते हैं तो महान कार्य बन जाते हैं ,ठीक उसी प्रकार एक अच्छा साहित्य जब जन-जन तक पहुँचता है तो और भी समृद्ध हो जाता है |...................................(लेखि‍का पत्रिका में सह संपादिका हैं )