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सोमवार, 18 अप्रैल 2016

                              

                  परख साहित्‍य की

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                       साहित्य का भूगोल बहुत ही व्यापक है ,इसे न तो किसी सीमा में बांधा जा सकता है और न ही किसी कालखंड में समेटा जा सकता है | बीते कुछ वर्षों में साहित्य ने अपनी विकास यात्रा में चहुँमुखी विकास किया है ,साहित्य के सभी विधाओं में नित नए प्रयोग हो रहे हैं जिसमें साहित्यकारों ने बढ़-चढ़कर अपने कलम की ताकत दिखायी है | साहित्य के सभी विधाओं में खासा प्रगति होने के वावजूद कहानियों पर कुछ ज्यादा ही काम   हो रहा है ,जिसमें नव साहित्यकारों की भूमिका काफी अग्रगणीय है | साहित्यप्रेम जीवन - प्रेम को जन्म देता है ,एक अच्छे साहित्य के अध्येता ये अच्छी तरह से जानते हैं कि एक अच्छे किताब के आने भर से लाखों बातूनी किताबें निरर्थक व् रसहीन हो जाती है | जब कोई  रचनाकार किसी रचना का सृजन करता है तो उसकी दिली ख्वाहिश यही होती है कि उसकी यह रचना जन-जन तक पहुंचे यही नहीं वह यह भी चाहता है कि उसके इस दुनियां में न रहने पर उसकी कृति लोगों के बीच जीवित रहे | हो सकता है वह अपने जीवन काल में साहित्य निधि ज्यादा न बटोर पाया हो पर जब वह इस दुनियां में न रहे तो लोगों के दिलों में रहे | एक रचनाकार कभी भी अकेला नहीं होता है,अकेलेपन में भी उसके विचार उसके साथ होते हैं और यही बात उसे औरों से अलग करती है | साहित्य सृजन हमारे भीतर सिर्फ ज्ञान ही नहीं देता है बल्कि एक नया वातावरण देता है एक नयी सोच देता है जिससे हम चीजों को बारीकी से समझते हैं और समाज के सामने स्वस्थ रूप में परोसते हैं | जब भी कोई साहित्यकार को साहित्यिक पुरस्कार मिलता है तो किसी एक कृति के बजाय उसके समस्त लेखन एवं साहित्यिक सेवा को देखकर दिया जाता है | पर बड़े दुःख की बात है कि आज हमारे साहित्यकार उसी पुरस्कार को वापस कर अपना रोष प्रकट कर रहे हैं जो शायद साहित्यिक नजरिए से अच्छा नहीं है | बरसों बरस लग जाते हैं एक व्यक्ति को लेखक बनने में,भाषा को प्राण देने में तब जाकर एक साहित्य का सृजन होता है ,हमें उस साहित्य की गरिमा को समझना होगा तभी सच्चे अर्थों में हम साहित्य से जुड़ सकते हैं | साहित्यिक गरिमा से ओत-प्रोत व्यक्ति पहले चीजों को समझता है ,तब अपने विचार प्रकट करता है पर आज जो देश में सम्मान वापसी की होड़ लगी है उसे देखकर तो यही लगता है कि हमारे साहित्यकार बिना सोचे-समझे अनुकरण की नीति में बहे जा रहे हैं | हर व्यक्ति की स्मृतियाँ उसका निजी साहित्य होती है,जिस तरह से साहित्य और कला का स्वरुप युद्ध और धन के संबंधके सामान है ठीक उसी प्रकार साहित्य और साहित्यकार दोनों एक -दुसरे की निजी जरुरत हैं | वह मनुष्य बड़ा भाग्यवान है,जिसकी कीर्ति एक साहित्यकार के रूप में व्याप्त है | साहित्य ऐसी साधना है जो ,शायद कलमकार लिखकर भूल गए होंगे पर उनकी यह कीर्ति आज भी चन्दन की भांति अपनी खुशबू हवाओं में बिखेर रही है | साहित्य हमें शब्द-दर-शब्द आईना दिखाती है,हमें जीवन के घोर अंधियारे में मार्ग दिखाती है और एक सच्चे दोस्त की भांति हमारा पथ-प्रदर्शन करती है | साहित्य विहीन समाज पशुता को दर्शाता है ,साहित्य पढने वाला और साहित्य से प्रेम करनेवाला हर शख्स निश्चित ही किसी-न किसी काल में एक श्रेष्ठ साहित्य की उत्पति करता है,जिसे लोग युगों-युगों तक पढ़ते हैं और अपने जीवन चरित्र में उतारते हैं | साहित्य हमारे जीवन के आकेलेपन को कम करती है और व्यस्तम से व्यस्तम दिनचर्या में भी सृजन की और प्रशस्त करती है,पर इधर कुछ वर्षों में साहित्य का बहुत हद तक पतन हुआ है,जिसका हमारे समय पर,हमारी सोच पर ,हमारी सृजनशीलता पर गहरा प्रभाव पड़ा है | साहित्य में बाजारीकरण  की प्रवृति इधर बहुत तेजी से बढ़ रही है, ऐसा लगता है जैसे साहित्य भी महज एक वस्तु,एक उत्पाद बनकर रह गई है तो स्वाभाविक सी बात है कि इस बाजार में मौजूद हर व्यक्ति ऐसी उत्पाद-वस्तु का मूल्य लगाने का अधिकार बहुत ही सहज रूप में पा जाता है  , ऐसे में एक अच्छे साहित्य का बचा रहना थोडा मुश्किल सा प्रतीत होता है | साहित्य की हमेशा से ही एक खास बात रही है कि वह जटिल से जटिल तथ्यों को बड़े ही सहज ढंग से समाज में परोसता है ,ऐसे में साहित्य और साहित्य के वर्तमान को समझना होगा |  पाठकों की भी बड़ी तेजी से कटौती हो रही है,जिसके लिए बाजार,रचनाकार-साहित्यकार सब बराबर के जिम्मेदार हैं | साहित्य में प्रचार-प्रसार पहले भी होता रहा है और आज भी हो रहा है पर इधर कुछ साहित्यकारों ने जिस तेजी से साहित्य को बढ़ा-चढ़ाकर अरुचिकर बनाया है वह बेहद ही चिंतनीय बात है,साहित्य का अपना सत्य होता है उसे किसी भी राजनितिक सत्य की जरुरत नहीं होती है ,पर आज हमारा साहित्य राजनीत जैसे पचड़ों में पड़कर अपनी गरिमा खोता जा रहा है |  आखिर कोई तो कारन होगा कि इतनी प्रचुर मात्रा में साहित्य सृजन और चिंतन होने के बावजूद अभी भी साहित्य का सफ़र पेचिदा है,अभी भी उसकी स्थिति दयनीय है | साहित्य का जन-जन तक पहुँच पाना , हर व्यक्ति के सोच में शामिल होना आज साहित्य की नितांत आवश्यकता है | जिस तरह से महान विचार जब कर्म में परिणित हो जाते हैं तो महान कार्य बन जाते हैं ,ठीक उसी प्रकार एक अच्छा साहित्य जब जन-जन तक पहुँचता है तो और भी समृद्ध हो जाता है |...................................(लेखि‍का पत्रिका में सह संपादिका हैं )


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