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सोमवार, 25 अप्रैल 2016

                                   कहानी (छोटी सी भूल )  

                                                                                                            संगीता सिंह 'भावना' 

                          नवंबर की सोंधी धूप कुछ-कुछ शरीर को सुकून देने लगा था,मौसम में थोड़ी नमी थी फिर भी प्रकृति और मौसम के बीच गज़ब का समन्वय और संतुलन अद्भुत बात थी | रेवा अपने और प्रशांत के बीच के संतुलन को आँकने लगी और अतीत की गहराइयों में उलझती चली गई | ,रेवा घर के काम समेटकर खुद को थोड़ा तैयार किया और बालकनी की ओझल होती धूप का आनंद एक कप चाय लेकर करने पहुँच गई | अभी प्रशांत के आने में करीब घंटे भर की देरी थी , हालांकि ऑफिस से आने वाले लोगों का क्रम चालू हो गया था | उसका किराए का मकान था तो महंगा पर बाजार की गहमागहमी और बाकी सारी सुविधाओं  को देखते हुये उसने पैसे को ज्यादा महत्व नहीं दिया | और फिर प्रशांत की गैर हाजिरी में उसके मन बहलाने का साधन भी तो यही मकान था | शादी के नौ  बरस पूरे होने को थे पर यूं लगता था जैसे एक युग बीत गया | इन नौ  सालों में रेवा ने बस एक सी रूटीन लाइफ ही देखी थी ,रोज सुबह उठकर प्रशांत को चाय और अखबार पकड़ाती और दैनिक दिनचर्या में लग जाती फिर वही शाम को प्रशांत के ऑफिस से लौटने का इंतजार और फिर थोड़ी बहुत औपचारिक बातचीत के बाद नीरव शांति .....! न कोई उत्साह न कोई उमंग |इन नौ  सालों में यादों का एक लंबा सिलसिला बन चुका था ,जिसे याद कर सिर्फ दुख और उदासी के सिवा कुछ भी हासिल नहीं था | रेवा इन्हीं सब बातों मे खोई तीन वर्ष पहले के एक प्रसंग में उलझती चली गई | उन दिनों सुनीता दीदी गर्मी की छुट्टियों में अपनी एकलौती और प्यारी बेटी पीहू के साथ आई हुई थी ,पीहू की चंचलता से पूरा घर एक उत्सव में तब्दील हो गया था | प्रशांत भी उसकी बाल-सुलभ चंचलता से अनभिज्ञ न थे ,रेवा तो बस पूरे दिन पीहू को गोद में चिपकाए रहती और ऐसा करके उसके खाली पड़े वीरान दिल में मातृत्व की भावना प्रबल हो उठती | एक शाम जब रेवा सुनीता दीदी के कमरे में उन्हें चाय के किए जगाने गई तो पीहू सुनीता दीदी से चिपक कर सो रही थी यह देखकर उसका मन भी अपने बच्चे की खातिर तड़पने लगा | खाने -पीने के बाद जब प्रशांत अपने कमरे में कोई पत्रिका लिए पढ़ रहे थे रेवा ने अपने मन की बात प्रशांत से शेयर किया इतना सुनते ही प्रशांत आग-बगुला हो गए और चीखते हुये बोले तुम्हें ये कौन सा नया रोग लग गया है जब देखो बच्चा-बच्चा करते रहती हो ,तुम्हें पता भी है कि तुम्हारी इसी जिद की वजह से मुझे कितनी शर्मिंदगी उठानी पड़ी ,जब डॉक्टर ने यह बताया कि तुम कभी माँ नहीं बन सकती | अचानक तो रेवा को विश्वास ही नहीं हुआ कि यह सत्य है उसने दोनों हाथों से अपने कान को बंद कर लिया और वही निढाल हो फर्श पर गिर गई और पूरा कमरा उसकी सिसकियों से देर रात तक गूँजता रहा | उसके सामने उस दिन की सारी घटना दृष्टिगत होने लगी ............जब डॉक्टर ने रिपोर्ट देखकर कुछ इशारा किया तो एकाएक प्रशांत बड़े प्यार से उसे बाहर ले आए हालांकि उनके चेहरे का रंग उड़ा हुआ था ,,बाहर लाकर उन्होने उसे वहीं बैठने को कहकर खुद केबिन में चले गए और जब केबिन से बाहर आए तो वह प्रशांत और थोड़ी देर पहले के प्रशांत में जमीन आसमान का अंतर था | इन चंद मिनटों में उनका पूरा हुलिया ही बदल  गया था ,वो वर्षों के बीमार प्रतीत हो रहे थे ,,रेवा ने बहुत कोशिश किया यह जानने का कि आखिर हुआ क्या ,डॉक्टर ने क्या कहा .....? पर प्रशांत बड़े ही शांत भाव से उसे यह कहकर बहला दिये कि डॉक्टर ने कहा है कि सब ठीक है और आज अचानक उनका यह कहना कि तुम कभी माँ नहीं बन सकती |  माना कि मर्द के प्यार-मुहब्बत की मियाद बहुत छोटी होती है पर इतनी संकीर्ण भी होती है ये उसने पहली बार जाना | इंसानियत के नाते ही सही ,,कम से कम बोलने के पहले एक बार सोच तो लिया होता कि इस तरह की बातों का एक स्त्री के दिल पर कैसा बीतता है | उस दिन के बाद रेवा कभी भूले से  भी प्रशांत से  बच्चे का जिक्र नहीं किया , औरत अपने प्रति आने वाले प्यार और आकर्षण को समझने में चाहे एक बार भूल कर जाये,लेकिन वह अपने प्रति आने वाली उदासी और उपेक्षा को पहचानने में कभी भूल नहीं करती | प्रशांत का व्यवहार दिन -ब -दिन संकुचित होता जा रहा था ,कभी बहुत खुश होते  फिर अगले ही क्षण मातम मनाने जैसा माहौल बना लेते  | रेवा भी अब पहले जैसी नहीं रही ,वक्त के थपेड़ों ने उसे अंदर तक झकझोर दिया था उसकी आँखों में आंसुओं के समंदर की जगह रेगिस्तान का फैलाव बदस्तूर बढ्ने लगा | पर आज अचानक  प्रशांत के ऑफिस के जरूरी कागजात वाली आलमारी खुली देखकर उसके मन में एक उत्सुकता हुई क्योंकि आज के पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था कि प्रशांत वो आलमारी खुली छोड़ जाए | अभी वह एक दो फाइलों को इधर-उधर खिसकाया ही था कि उसकी नजर गाइनी स्पेशलिस्ट 'अल्का माथुर'' के फाइल पर पड़ी और वह झट उसे खींच कर सरसरी निगाह से देखना शुरू किया | रेवा इतनी पढ़ी-लिखी तो थी कि चीजों को समझ सकती थी ,पर उसने वह फ़ाइल को  लेकर डॉक्टर से मिलना ज्यादा उचित समझा | जब रेवा डॉक्टर के केबिन में पहुंची तो डॉ. अल्का उसे झट पहचान गई और बड़ी ही गर्मजोशी से उसका स्वागत करते हुये पूछा ......और बताओ रेवा --तुमने क्या सोचा है बच्चे के बारे में ......? मैं तो कहती हूँ कि तुम 'टेस्ट ट्यूब बेबी' के लिए अपनी सहमति दे तो ज्यादा अच्छा होगा क्योंकि मैंने सारे प्रयास जो करने थे वो इन बीते दिनों में कर डाले ,,और कहीं से भी प्रशांत के सुधार की गुंजाइश नहीं दिख रही |एकाएक तो रेवा को विश्वास ही नहीं हुआ ,उसने अपने हकलाते आवाज में पूछा.....''तो क्या डॉक्टर मुझमें कोई खराबी नहीं है .....? पर प्रशांत तो कहता है कि मैं माँ बनने के काबिल ही नहीं '' डॉ अल्का को सारा माजरा समझते देर न लगी वह आगे बढ़कर बड़े ही प्यार से रेवा को समझाया .....हाँ रेवा, तुम माँ बनने के बिलकुल काबिल हो और सारी परेशानी प्रशांत में ही है पर उसका पुरुषोचित  दंभ उसे आज भी खुद से न्याय नहीं करने दे रहा | रेवा का पूरा वजूद बर्फ हो चुका था | डॉ ने मामले की गंभीरता को देखते हुये बोली .....रेवा संभालो खुद को और नर्स को बुलाकर दो कप कॉफी भेजने को कहा | जब तक कॉफी बनकर आती तबतक रेवा अतीत के तहखाने में भटकती रही और वो सारे मंजर अनायास दृष्टिगत होते रहे | गरम कॉफी का घूंट पीते हुये रेवा धीरे से बोली,डॉ मैं आज तक इस सच्चाई से अवगत नहीं थी ,इसलिए शायद मेरी यह हालत हो रही है | इन बीते सालों में मैं अनगिनत बार मरी हूँ ,कभी-कभी तो मेरे मन में आत्महत्या तक के भी ख्याल आते थे ,पर अगले ही पल प्रशांत का निरीह चेहरा मुझे रोक देता था | अब इस सच्चाई को कुबूल करने के लिए मुझे वक्त चाहिए | ''हमने अपनी ज़िंदगी के ये महत्वपूर्ण क्षण कुढ़-कुढ़कर गँवा दिए,आप तो अच्छे से समझती होंगी कि यह किसी भी स्त्री की ज़िंदगी के कितने कीमती समय होते हैं | जब घर-आँगन में किलकारियाँ गुंजनी थी और हमारे जीवन में खामोशी का  ग्रहण लगा था '' डॉ चुपचाप रेवा के चेहरे के अंतहीन दर्द  को देखे जा रही थी केबिन में सन्नाटा छाया रहा | समय इंसान को किस कदर बदल  कर रख देता है यह रेवा से ज्यादा इस समय कोई नहीं महसूस कर सकता था | रेवा के लिए ज़िंदगी का यह मोड काफी नाजुक मोड था, उसने खुद को संभालते हुये घर की ओर रुख किया,, और मन ही मन  सोचा .....''क्या हुआ जो प्रशांत मुझे नहीं समझ पाया पर मैं तो अपने प्रशांत को खुशी से संभाल लूँगी '' बालकनी में ठंढ बढ़ चली थी ,जैसे ही वह वापस कमरे में जाने के लिए मुड़ी दूर से प्रशांत दफ्तर से आता दिखाई दिया ,,रेवा अपने चेहरे पर आई हुई उदासी को परे झटककर प्रशांत का खुले दिल से स्वागत किया जैसे कुछ हुआ ही न हो | रात को खा-पीकर जब प्रशांत और रेवा  बिस्तर पर लेटे तो रेवा कमरे के उस फैले अंधेरे में खुली आँखों से चमकते जुगनू को देर रात तक महसूस करती रही ,नींद आँखों से कोसों दूर था | वह प्रशांत से वह सब बातें कहकर उनके बीच आई हुई नीरसता को खत्म करना चाहती थी ,पर बात कहाँ से शुरू करें इसी पाशोपेश में न जाने कितनी देर शून्य को निहारती रही | उधर प्रशांत की आँखों से भी  नींद गायब थी ,उसे बार-बार डॉ.माथुर की चेतावनी याद आ रही थी ......''देखिये मि. प्रशांत ,खुद से भागने से अच्छा है रेवा को सब सच बता दीजिये,क्योंकि पुरुष के पश्चताप स्त्री सहन नहीं कर पाती और जहां तक मैं रेवा को जानती हूँ वह बहुत ही सुलझी महिला है ,वह जरूर आपको माफ कर देगी | एकाएक प्रशांत का अन्तर्मन धिक्कार हो उठा ,मन हुआ कि रेवा के गोद में सिर रखकर रोता रहे , भर्राए गले से उसने पूछा ,''अच्छा रेवा ,एक बात बताओ,इतना सब जानकर भी तुम्हारा मन नहीं घबराया ....? जिन दिनों मैं तुम्हें दोषी करार तुमसे चुप्पी साध लिया था,उन दिनों जरा देर को भी तुम्हारे मन में पराजय की भावना नहीं आई थी ....? मुझे प्रसन्न रखने के लिए तुम्हारे हास्यास्पद प्रयास,मुझे खो देने का भय,,सभी कुछ तो मेरे सामने से गुजरा पर मैं ही बेवकूफ़ न जाने कहाँ भटकता रहा | तुमने  इतनी करुणा क्यों किया मुझपर ,,इसीलिए न कि तुम मुझसे बेहद प्यार करती हो ....? बच्चे के बिना घर क्या होता है ये मैंने भी महसूस किया है,पर मैं डरता था खुद से कि कहीं तुम सारी सच्चाई जानकर मुझसे दूर न चली जाओ और अपनी सारी पृष्ठभूमि के साथ मैं  बिलकुल निरीह और अकेला न रह जाऊँ |   रेवा ने निहायत ही आत्मविश्वास भरे लहजे में कहा ,देखो प्रशांत ,कभी-कभी कोहरे के कारण सूर्य देर से निकलता है ,पर ऐसा नहीं कि वह अपने प्रकाश पुंज को धूमिल कर लेता है ,उसे पता रहता है कि उसका निकलना तय है भले ही थोड़ी देर ही सही | मुझे भी अपने प्रशांत पर पूरा भरोसा था कि एक न एक दिन वह मुझे जरूर समझेगा | 

               नहीं रेवा,मैं तुम्हारा गुनहगार हूँ,पर मैं हारा नहीं हूँ ,मुझे अपनी भूल का पश्चताप है,तू देखती रहना,मैं सब करूंगा,तुम्हें वो सारे सुख दूँगा जिससे तुम आज तक वंचित रही हो ....बोलो रेवा,दोगी न मेरा साथ....? ''और अपने काँपते हाथों से रेवा के दोनों कंधे पकड़कर उसका चेहरा ऊपर उठाकर अपलक निहारता रहा | उसके झुकी पलकों वाले चेहरे को देखकर एक अजीब-सा ख्याल मन में आया ......मानो वह अभी ही ''माँ'' बन गई हो ....! और ऐसा लगा ,जैसे उसका चेहरा पहले से भी अधिक गुलाबी हो गया हो .....|

                                                                     

5 टिप्‍पणियां:

  1. हार्दिक आभार रचना व्यास जी,अपनी अमूल्य प्रतिक्रिया से प्रोत्साहित करने के लिए !!!

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