समर्थक

कुल पेज दृश्य

रविवार, 8 मई 2016



बहुमुखी प्रतिभा के धनी कविन्द्र रबिन्द्रो नाथ टैगोर 

---- प्रियंवदा अवस्‍थी

भारतीय साहित्य जगत में गुरुदेव रबिन्द्र नाथ टैगोर एक वह विशिष्ट नाम हैं जिन्हें देश ही नही अपितु विदेशों भी साहित्य प्रेमियों के मध्य खासा सम्मान प्राप्त है ..साहित्य जगत में विश्वकवि के रूप में उभरे इस महान व्यक्तित्व को एक साहित्यकार के रूप में एशिया में सर्वप्रथम अपनी साहित्य सर्जना गीतांजलि के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया ..टैगोर यूँ तो मुख्य रूप से बांग्ला साहित्य के सिरमौर रहे किन्तु हिंदी अंग्रेजी साहित्य जगत में उनकी मानवीय संवेदनाओं पर आधारित ऐसी तमाम रचनाएँ अमिट हो गयीं हैं जो आज भी बुद्धिजीवी वर्ग के मध्य मील का पत्थर मानी जाती हैं ..इनके लिखे राष्ट्रभक्ति के गीत आज विश्व के दो राष्ट्रों [भारत एवं बांग्लादेश ] के राष्ट्रगान हैं जो देह विदेह हो जाने के पश्चात् भी उन्हें जन जन के मध्य अमरत्व प्रदान करते हैं..हालाँकि वे राष्ट्रवाद से ज्यादा मानवतावादी व्यक्ति थे जिन्हें उनकी रचनाओं में सहज ही महसूस किया जा सकता है ...कथा नाटक गीत संगीत काव्य चित्रकारी इतना कुछ एक व्यक्ति में समाहित हो ,इतनी सारी विशेषताएं और अमूमन हर विधा में जिसे महारत हासिल हो,विरलों को ही प्राप्त होती हैं ..ऐसी अनगिन अनमोल धरोहरों के जनक,सृजनकर्ता,इस प्रकृति प्रेमी कवि, चित्रकार एवं साहित्यकार का जन्म ७ मई १८६१ को कोल्कता के एक संपन्न परिवार में हुआ जो यूँ तो अपने पिता श्री देबेन्द्र नाथ ठाकुर के कनिष्ठ पुत्र रहे किन्तु अपने जीवनकाल में इन्होने जिस उच्चस्तरीय साहित्यिक एवं रचनात्मक कार्यों का संपादन किया उससे वे स्वदेश ही नही अपितु विदेशो में भी खासे लोकप्रिय हुए ,यह कहना कदापि असत्य न होगा की रबिन्द्र नाथ टगोर वो सख्शियत बनकर उभरे जिन्होंने अपने देश की भाषा संस्कृति एवं शैली में पाश्चत्य भाषा शैली व संस्कृति का सामंजस्य बिठाकर उससे जनमानस को सुपरिचित कराया, इनके पिता जी इन्हें बैरिस्टर बनाना चाहते थे जिसके लिए इन्हें कानून की पढाई करने को लन्दन यूनिवर्सिटी भी भेजा गया किन्तु कला क्षेत्र के इस अन्यान्य पुजारी का वहां मन नही रमा ,पढाई तो जैसे भी कर संपन्न कर ली किन्तु वहां से बिना अपनी डिग्री लिए ही वे वापस भारत लौट आये ,देश उस वक़्त क्रांति का भीषण दौर जी रहा था ,यहाँ आकर इन्होने जीवन को अपने व्यक्तिगत आयाम “एकला चलो रे “ से देखा सुना जिया और अभूतपूर्व अभिव्यक्तियाँ भी की ,जिसमे वे बेहद सफल तथा सम्मानित भी हुए ,
स्वतंत्रता संग्राम के प्रत्यक्ष दर्शी रोबिन्द्रो नाथ बेहद कोमल व संवेदन शील ह्रदय के स्वामी थे जो राष्ट्रवाद से कहीं ज्यादा मानवतावाद के उपासक थे ,तत्समय पत्र पत्रिकाओं में लिखते हुए उन्होंने जलियाँ वाला कांड की उन्होंने घोर निंदा की तथा तात्कालिक ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रदत्त अपनी नाईट हुड की उपाधि तक वापस लौटा दी थी ..यहाँ यह जानकारी दे दूँ कि ये मान सम्मान के लिए प्रदत्त वो उपाधि होती है जिसको प्राप्त करने के उपरान्त किसी सम्मानित व्यक्ति के नाम के आगे सर लगने लगता था .....
एक कवि,एक दार्शनिक,एक कहानीकार ,गीतकार, संगीतकार नाटककार ,निबंधकार और चित्रकार और इन सबसे इतर एक संवेदनशील मानव के रूप में सुस्थापित इस अद्भुत व विलक्षण व्यक्तित्व ने जहाँ एक ओर भारतीय साहित्य जगत को समर्पण भाव से ओतप्रोत गीतांजली जैसी दिव्य भेंट दी  ..वहीँ काबुलीवाला पोस्टमॉस्टर ,मास्टर साहब जैसी अतिसंवेदशील कहानियों ने उन्हें लोकप्रिय बनाया चोखेर बाली .घरे बाहिरे , गोरा जैसे उपन्यास ,नाटकों में डाकघर ,राजा और विसर्जन जैसे बहुचर्चित नाटको की रचना कर तथा तकरीबन दो हजार से भी ज्यादा अमिट गीतों की सर्जना उन्हें विशिष्ट स्थान प्रदान करती है ...प्रकृति से अगाध स्नेह रखने वाले जमीनी हकीकत को ह्रदय से महसूस कर शब्दों में उकेरने वाले इस बहुमुखी कलाकार की देह लीला का अवसान ७ अगस्त सन १९४१ में हुआ किन्तु प्रकृति की गोद में उनकी कल्पनाओं के सागर तट को अपनी दिव्यता के आलोक से प्रकाशित करती चतुर्दिक अपने ज्ञान की सुगंध को प्रसारित करती उनके ही द्वारा बसाई गयी शान्तिनिकेतन जैसी अनोखी व अनूठी शिक्षण संस्था के कण कण उनकी रचनात्मकता कलात्मकता संवेदनशीलता के प्रत्यक्ष प्रमाण बन दुनिया को अद्यतन अपनी ओर आकर्षित कर रही है ...साहित्य सेवा में उनका नाम भले ही उनकी विश्वप्रसिद्ध रचना गीतांजलि से सम्बद्ध है किन्तु कला की भिन्न भिन्न विधाओं में माहिर रोबिन्द्रो नाथ को एक बहुमुखी कलाकार की उपाधि देना मेरी दृष्टि में ज्यादा उपयुक्त होगा ....जिसने साहित्य जगत में ही नही अपितु जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी वटवृक्ष सी जड़ें जमा दी है जिनके अवशेष हम जैसी कितनी ही पीढियां सदियों सदियों तक सहेजती ही रहेंगी........(लेखिका करुणावती साहित्‍य धारा की वरिष्‍ठ सलाहकार हैं )

रविवार, 1 मई 2016

                                जीवन की एक नयी सुबह . . .

                                                         ---      श‍िप्रा त्रिपाठी

शिवांगी के पसंदीदा हल्के बैंगनी रंग के परदे लगातार आधी खुली खिड़की से आती हवा के कारन  उड़ से रहे थे मानो इस सुहानी रात का जश्न मना रहे हों, बाहर पूर्णिमा का चन्द्रमा था इसीलिए  रौशनी  के कारन रात की खूबसूरती को शिवांगी अपने जीवनसाथी की बाँहों में  समाये हुए  ही बिस्तर पर लेटे- लेटे महसूस कर रही थी । बाहर  से आती मनमोहक रातरानी के पुष्पों की खुशबू से भी उसका मन प्रफुल्लित हो उठा था, जो की सोम ने लगवाये थे उसके लिए सिर्फ, बस एक बार   ही तो बताया था शिवांगी ने उन्हें की कितनी पसंद है उसे रातरानी की खुशबू। सलोने से सुन्दर  मुख वाली शिवांगी की नींद जब यूँ ही अचानक टूटी रात के २ बजे,  वो अपने सोम को बस देख ही रही थी और ईश्वर को धन्यवाद कर रही थी सोम को अपने अर्धनारेश्वर के रूप में प्राप्त करने के लिए,  देख रही थी की उसके सोम ने उसका हाथ अच्छे से पकड़ रखा था और नींद में भी उनका प्रेम मानो उनके मुख पर दिखाई दे रहा हो और शिवांगी उसे महसूस कर रही थी, सिर्फ अभी नहीं पिछले डेढ़ वर्षों से । जब से उनका विवाह  हुआ है उनका पारस्परिक प्रेम निरंतर बढ़ता ही रहा है और आज तो एक ख़ुशी की चमक भी थी उनके चेहरे पर और  हो भी क्यों  ना अभी सोने से पूर्व ही तो निश्चय किया था उन दोनों ने अब अपना परिवार आगे बढ़ाने  का, दो से तीन होने का । ये सोच कर ही एक तरफ तो शिवांगी को कुछ शर्म सी आई तो दूसरी ही तरफ एक अनंत आनंद का अनुभव भी कर रही थी वो की अब उसे भी वो  मातृत्व सुख मिलेगा जिसके बिना एक नारी का जीवन अधूरा सा होता है । फिर वो सोचने सी लगी की इतना आसान नहीं था उसके लिए ये निर्णय, उसने तो निश्चय ही कर रखा था की एक नए जीवन को इस दुनिया में नहीं लाएगी वो  जब तक उसके भविष्य को प्रेम व शांति  से भरने का और एक सही दिशा देने का  भरोसा ना हो उसे । जो उसने भोगा था अपने बच्चों को नहीं सहने देगी वही । शिवांगी यही सब सोच रही थी  की सहसा उसे याद आया की आज तो ८ अक्टूबर है सहसा ही उसके चेहरे की वो मनमोहक  मुस्कराहट गायब सी हो गयी,  उसने सोम का हाथ हटाया और बालकनी में आ गयी ।
 इस पूर्णिमा के चाँद को देख उसकी आखों के सामने सहसा ही २ वर्ष पूर्व का वह दृश्य जीवांत हो उठा। आज ही की रात तो थी वो जब रात के २ बजे सहसा कहीं पड़ोस से बर्तन या कुछ गिरने की आवाज आई थी और वो लड़की डर  के मारे अचानक  नींद से जाग कर बिस्तर के पीछे छुप गयी थी । बहुत  देर यूँ ही छुपी सी रही मानो उसके बचपन के डर ने उसे जकड़ सा लिया हो । नयी नहीं थी ये बात उसके लिए यूँ अचानक थोड़ी सी भी आवाज आने पर जाग सा जाना, जाग कर बिस्तर के पीछे या नीचे छुप सा जाना। पहले तो जब कभी बर्तन गिरने और टूटने की आवाजें आती थीं यूँ, उसकी माँ उसे थोड़ी देर बाद दौड़ कर आकर खुद बिस्तर के नीचे छुपा देती थी उसे , बाद में तो शिवा ऐसी आवाजें आने पर स्वयं ही छुप जाया करती थी। कई बार तो पूरी-पूरी रात ही उस बातों से अनजान नादान बच्ची ने बिस्तर के नीचे ही  गुजारी थीं। उसे बिस्तर के नीचे से अजीब-अजीब आवाजें सुनाई देती थी सामान के गिरने-पड़ने की, कई बार पिता के कुछ खींच कर फेंकने की, फिर माँ के कराहने की, चिल्लाने की, पिता के पैरों के अपनी  तरफ बढ़ने की, माँ के तुरंत उठ कर उनका हाथ पकड़ने की, कहने की की छोड़ दो मेरी बच्ची को उसका क्या कुसूर है, वो छोटी सी बच्ची है, आप चले जाइए जिसके भी पास जाना है आपको, मैं नहीं रोकूंगी पर मेरी बच्ची को छोड़ दो।  कई बार शिवा ने महसूस किया था जैसे वो अपने माँ के पैरों जंजीर हो जिसका फायदा उसके पिता ने उठाया। कभी-कभी जब वो समय से नहीं छुप पाती थी उसके पिता उसे उसके पैरों के बल उल्टा पकड़ कर माँ से कहते थे मुझे जाने दोगी या नहीं शांति से, किसी से कुछ कहना नहीं है तुम्हें वर्ना मैं क्या करूँगा इसका अंदाजा नहीं है तुम्हें फिर माँ रोते हुए सिर्फ हाथ ही जोड़ कर उनके पैरों में गिर जाती थी । रह-रह कर उसे बचपन की सारी बातें याद आ रही थीं जब उसे महसूस हुआ की अब वो २८ वर्ष की हो गयी है और ऐसा कुछ भी नहीं है उसके आसपास अभी तब उसने चैन की सांस ली थी अपनी साँसों को सम्हाला उसने  पर नींद ने दामन छोड़ दिया था ।  ये  भी कोई  नयी बात नहीं थी  उसके लिए यूँ रात भर बिन बात के जागना। अब क्या करती अपने हॉस्टल के रूम से लगी छोटी सी बालकनी में आ गयी थी और पूर्णिमा के चाँद को निहारने लगी थी…कब चाँद चला गया और चिड़ियों की मधुर आवाजें आने लगीं उसे पता ही न चला था की कब रात बीती इन्ही ख्यालों में ।  अच्छे से समझ गयी थी शिवा की बचपन में मस्तिष्क पटल पर पड़े असर का कितना प्रभाव रहता है एक व्यक्ति के पूरे जीवन पर । यूँ तो जैसे- जैसे वो बड़ी होती गयी रात में घर के बर्तनों ने गिरना बंद कर दिया था, लगता था बर्तनों के गिरने की वजह सही नहीं थी ये उसके पिता को भी समझ में आ गया था ।  अब तो उसके माता-पिता रात में साथ में खाना भी खाते थे. लगता था  उसकी माँ ने एक स्त्री का हृदय कितना बड़ा होता है और उसके क्षमा करने की शक्ति कितनी ज्यादा होती है इसका सुबूत दे दिया था पर फिर  भी सब कुछ ठीक होते हुए भी शिवा के मन पर जो प्रभाव पड़ा था पिछले कुछ वर्षों में, उसके असर के कारण वो किसी भी बात की ख़ुशी का अनुभव कर ही नहीं पाती थी, न तो खुल कर कभी हस ही पाती थी और ना ही अपनी बात कभी किसी को बता पाती थी मानो एक बवंडर था जो उसके मन में सदैव चलता रहता था अगर कभी बहार आ जाता तो ना जाने वो क्या कर जाती। सूरज देव भी बस आने ही वाले थे की उसे बगल के रूम के दरवाजे के खुलने की आवाज आई, उसकी सहेली संध्या उठ चुकी थी और अब योग करने ही आई थी बालकनी में । शिवा को यूँ मूरत बना देख उसने पूछा " क्या पूरी रात फिर से यहीं गुजारी तुमने" और फिर शिवा ने किसी तरह से उसकी तरफ देखा ही था बस,  संध्या जान गयी उत्तर अपने प्रश्न का।  फिर माहौल को हल्का करने के लिए पूछा था उसने " क्या हुआ कल जिस लड़के से मिलने गयी थी उन्ही के ख्यालों में थी क्या??"  फिर थोड़ा मुस्कुराई वो और शिवा के कंधे पर हाथ रख कर कहा  “कब तक यूँ शादी से भगति रहोगी शिवा?? सब एक जैसे नहीं होते हैं मेरी सहेली अभी तक कितने ही लड़कों को ना बोल चुकी हो तुम कुछ से तो बस दो पल मिल कर ही मना कर देती हो, ऐसे कैसे चलेगा… लोगों  से मिलो उन्हें जानने की कोशिश तो करो तुमने तो अपने आसपास ऐसा घेरा बना रखा है की कोई अंदर ही नहीं आ पता कभी। अब वो हमारे एस. डि. एम. साहब को ही देख लो कितनी कोशिश करते हैं तुमसे बातें करने की, तुम्हारे करीब आने की, अपनी पसंद जताने की पर तुम हो की कुछ महसूस ही नहीं करती हो. कभी सोचा है तुमने हमारे शहर में इतने ढेर सारे एन. जी. ओ. हैं फिर भी वो कितनी बार अपना कीमती समय निकाल कर तुम्हारे काम के बारे में पूछते हैं, कितनी मदत की है उन्होंने हमारे एन. जी. ओ. की. अब बताओ कौन ऐसा करेगा बिना किसी बात के?? उस दिन उन्होंने तुम्हें लंच के लिए पूछा तब भी तुमने मना कर दिया, क्या कभी उनकी आखें देखीं हैं तुमने उनमें कितनी इज्जत है तुम्हारे लिए और एक ख़ास स्थान भी. खैर तुम्हारी मर्जी " . ये सब  बोल कर संध्या ने एक बार उसकी आखों में देखा। बहुत आत्मीयता थी संध्या की आखों में फिर  चली गयी वो अपना योग करने। पसंद तो शिवा भी करती थी मन ही मन एस. डि. एम. साहब को और उनके प्यार को महसूस भी करती थी वो पर उसके मन में अजीब सा डर जो बैठा था विवाह को लेकर उसका वो क्या करती, कैसे पूछती वो किसी से की आप विवाह के बाद घर को नर्क तो नहीं बनाएंगे ना!! पर जैसे-जैसे सूरज भगवन ऊपर आ रहे थे मानो शिवा के मन के संशय दूर हो रहे थे. . . सोचा उसने सही ही तो कहा है संध्या ने सब एक जैसे नहीं होते अभी तक हर ऐसे लड़के को उसने मिलते ही ना बोल दिया था उसने  जिस में उसे उसके पिता की छवि भी दिखाई दी पर एस. डि. एम. साहब  तो बिलकुल अलग ही थे. अब सूरज की किरणों ने शिवा के चेहरे पर पीला रंग बिखेरना शुरू कर दिया था मानो सूरज भगवन भी कह रहे हों की यही सही है शिवा और अपना आशीर्वाद दे रहे हों । उसने निश्चय किया था उसी वक्त की अब वो इन दूरियों को कम कर देगी और एस. डि. एम. साहब को उनकी बात रखने  का पूरा अवसर देगी. । उसके ५ माह बाद ही शिवा का विवाह हो गया था  एस. डि. एम. साहब के साथ और अपने  नए जीवन की शुरुआत पूरी ख़ुशी के साथ की थी उसने।
 अतीत में खोयी हुई शिवांगी को अचानक ही किसी ने पकड़ा पीछे से और “मोहतरमा हमें यूँ छोड़ कर मत जाया करें आप” ये कह कर. अपने आलिंगन में लिया, ये कोई और नहीं उसके एस. डि. एम. साहब  ही थे जिनकी पदोन्नति हो गयी थी और अब वो कलेक्टर बन गए थे. शिवांगी पीछे  मुड़ी और देखा अपने  सोम का चेहरा, उनके चेहरे की ख़ुशी देखते ही बन रही थी आज, पिछली बार इतने खुश तब थे वो जिस दिन शिवा ने हाँ कहा था विवाह के लिए। शिवांगी ने अपने  सोम को अपने शिव को गले से लगा  लिया बहुत खुश  थी वो ये सोच कर की उसने २ वर्षों पूर्व जो फैसला लिया था वो कितना सही था, नहीं तो अपने जीवन को वो आगे ही नहीं बढ़ा पा रही थी उस अकेलेपन में . यूँ ही नहीं बदला था उसने अपना नाम वो सच में अपने सोम की अर्धांगिनी बन गयी थी सिर्फ और सिर्फ उनकी शिवांगी। सोम को यूँ ही पकड़े हुए सोच रही थी वो की शिवं और शिवा, एक स्त्री और एक पुरुष एक दूसरे के बिना पूर्ण तो हो सकते हैं परन्तु संपूर्ण कभी नहीं फिर क्यों यूँ झूठे दिखावे  में पड़े रहते हैं वो, आजकल क्यों अपने आप को ही उँचा दिखाना चाहते हैं, वो होड़ तो झूठी है और सच्चाई केवल इस सम्पूर्णता को प्राप्त कर साथ- साथ आगे बढ़ने में है। वो सम्पूर्णता जिसे शिवांगी अभी महसूस कर रही थी अपने सोम की बाहों मे.          (लेख‍िका करुणावती साहित्य धारा में सलाहकार है )